मुख्य न्यायाधीश बोले- न्यायिक सक्रियता जरूरी, लेकिन इसे ‘न्यायिक आतंकवाद’ नहीं बनने देना चाहिए

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई ने शुक्रवार को न्यायिक सक्रियता की आवश्यकता और इसकी जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि न्यायिक सक्रियता जरूरी है, लेकिन इसे न्यायिक दुस्साहस या न्यायिक आतंकवाद में नहीं बदलना चाहिए। नागपुर जिला न्यायालय बार एसोसिएशन की तरफ से आयोजित सम्मान समारोह में बोलते हुए गवई ने कहा कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सभी की अपनी सीमाएं और अधिकार तय हैं। सभी को संविधान और कानून के अनुसार काम करना चाहिए।
भीमराम आंबेडकर को दी श्रद्धांजलि
मुख्य न्यायाधीश गवई ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि पूरा देश उनके योगदान का आभारी है। साथ ही गवई ने कहा कि जब संसद या सरकार कानून की सीमाएं लांघती है, तब न्यायपालिका को दखल देना पड़ता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि न्यायपालिका खुद अपनी सीमाओं को लांघे। न्यायिक सक्रियता बनी रहेगी, लेकिन इसे कभी न्यायिक दुस्साहस या आतंकवाद का रूप नहीं लेने देना चाहिए। इस दौरान गवई ने अपने जीवन की कुछ बेहद भावुक यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि कैसे उनके माता-पिता के संघर्ष और पिता के सपनों ने उनकी जिंदगी की दिशा तय की। उन्होंने कहा कि मैं तो आर्किटेक्ट बनना चाहता था, लेकिन मेरे पिता का सपना था कि मैं वकील बनूं। वह खुद वकील नहीं बन पाए थे क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने के चलते उन्हें जेल जाना पड़ा था। भावुक होते हुए गवई ने कहा कि हम संयुक्त परिवार में रहते थे। बच्चों की जिम्मेदारी मां और बुआ पर आ गई थी। गवई ने बताया कि जब उनका नाम हाई कोर्ट में जज बनने के लिए भेजा गया, तब उनके पिता ने कहा कि अगर तुम वकील बने रहोगे तो सिर्फ पैसे के पीछे जाओगे, लेकिन अगर जज बनोगे तो अंबेडकर के दिखाए रास्ते पर चलकर समाज के लिए काम करोगे। उन्होंने कहा कि कहा कि उनके पिता चाहते थे कि एक दिन वह भारत के मुख्य न्यायाधीश बनें, लेकिन 2015 में उनका निधन हो गया।
भावुक माहोल का हल्का करने के लिए गवई ने सुनाया मजेदार किस्सा
कार्यक्रम के दौरान जब मुख्य न्यायाधीश ने अपना अनुभव साझा कि तब माहौल भावुक हो गया था, जिसे हल्का करते हुए सीजेआई गवई ने एक मजेदार किस्सा भी साझा किया। उन्होंने बताया कि एक बार नागपुर कोर्ट में हेमा मालिनी के खिलाफ चेक बाउंस का मामला आया था। वह और तत्कालीन CJI शरद बोबड़े उनके वकील थे। उन्होंने कहा कि कोर्ट में इतनी भीड़ थी कि लोग सिर्फ हेमा मालिनी की एक झलक पाने के लिए उमड़ पड़े थे। हमें भी उस दिन बड़ा मजा आया कि उन्होंने हंसते हुए कहा। इसके साथ ही गवई ने यह भी कहा कि वह इस साल नवंबर में रिटायर होने के बाद अपने जीवन के अनुभवों पर आधारित एक किताब लिखने पर विचार कर रहे हैं। साथ ही मुख्य न्यायाधीश ने नागपुर बार एसोसिएशन की भी तारीफ की। उन्होंने कहा कि यह देश की सबसे धर्मनिरपेक्ष बार में से एक है, जहां सभी जाति और धर्मों के वकील एक-दूसरे के लिए और समाज के लिए काम करते हैं। उन्होंने कहा कि मैंने देखा है कि हिंदू वकील मुस्लिम समाज के लिए काम करते हैं और मुस्लिम वकील हिंदू समाज के लिए। यही भारत की असली ताकत है।



