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सोनिया-ममता फिर ममता-सोनिया और अब राहुल-अभिषेक, टूटती तृणमूल की घर वापसी की कवायद

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के पांव के नीचे से जमीन खिसकती जा रही है। विधायक जा रहे हैं। सांसद जा रहे हैं और पुराने साथी मुंह फेर रहे हैं। ममता बनर्जी ने तीन दशक पहले कांग्रेस की चौखट पर ठोकर मारकर अलग राह पकड़ी थी। आज वही चौखट उन्हें फिर बुला रही है। और इस बार वे इन्कार नहीं कर रहीं। आठ जून को विपक्षी गठबंधन की बैठक में ममता और सोनिया गांधी गले मिलीं। यह तस्वीर सबने देखी। लेकिन जो नहीं देखा वह यह था कि उस गले मिलने के पीछे एक राजनीतिक संदेश छिपा था। अगले दिन नौ जून को ममता खुद दस जनपथ पहुंचीं और सोनिया से लंबी बातचीत की। फिर 10 जून को ममता के भतीजे और तृणमूल महासचिव अभिषेक बनर्जी राहुल गांधी से मिलने पहुंचे। यह मुलाकात डेढ़ घंटे चली। अभिषेक के हाथ में एक मोटी फाइल थी। राजनीतिक हलकों में दावा है कि उस फाइल में विलय का रोडमैप दर्ज था। इसकी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इन्कार भी नहीं हुआ।

सोनिया का प्रस्ताव और ममता की पलट शर्त
सूत्रों के मुताबिक सोनिया गांधी ने ममता को कांग्रेस का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अभिषेक को महासचिव पद देने का प्रस्ताव रखा। ममता ने सोचने के लिए एक हफ्ते का वक्त मांगा। लेकिन अगले ही दिन अभिषेक राहुल के पास पहुंच गए। यह जल्दबाजी बताती है कि ममता के पास वक्त कम है। अभिषेक ने राहुल के सामने ममता के लिए राज्यसभा की सदस्यता और उच्च सदन में नेता प्रतिपक्ष का पद मांगा है। राहुल ने पार्टी में विचार का आश्वासन दिया है। यह मांग छोटी नहीं है। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद ममता को उस राष्ट्रीय मंच पर वापस ला सकता है जो वे बंगाल की हार के बाद खो चुकी हैं।

एनसीपी-शिवसेना का ऑफर भी मेज पर
सूत्रों के मुताबिक, एनसीपी (शरद पवार गुट) और शिवसेना (उद्धव गुट) ने भी अपनी छतरी तले आने का न्योता दिया है। हालांकि इन प्रस्तावों  की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और यह विकल्प फिलहाल कांग्रेस के प्रस्ताव के सामने गौण ही दिखता है। इस पूरी बातचीत का एक और पहलू है जो कम चर्चा में है लेकिन कम अहम नहीं। सूत्रों के मुताबिक अभिषेक बनर्जी पर जांच एजेंसियों का शिकंजा कसता जा रहा है। सीआईडी का तीसरा समन आ चुका है और प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई की आहट भी सुनाई दे रही है। ऐसे में अभिषेक ने राहुल से राजनीतिक और कानूनी संरक्षण का भरोसा भी चाहा है। यानी यह विलय केवल राजनीतिक जरूरत नहीं, व्यक्तिगत सुरक्षा का मामला भी बन गया है। तृणमूल के शीर्ष सूत्रों ने विलय की खबरों को निराधार बताया है। कांग्रेस ने भी इन मुलाकातों को विपक्षी एकजुटता की कोशिश बताया है। लेकिन राजनीति में खंडन अक्सर खुलासे से बड़ी खबर होता है। ममता ने 28 साल पहले जब कांग्रेस छोड़ी थी तो उनके पास जुझारू छवि थी, मजबूत जनाधार था और एक उम्मीद भरा भविष्य था। आज जब वे उसी दरवाजे पर लौट रही हैं तो हाथ में शर्तें हैं। वह पुरानी ताकत नहीं जो कभी थी। जब घर जल रहा हो तो पड़ोसी की छत भी घर लगने लगती है।

ममता की बेचैनी को समझना हो तो आंकड़े देखिए। विधानसभा चुनाव हारते ही करीब 58 विधायकों ने अलग गुट बना लिया। संसद में तृणमूल के कुल इकतालीस सांसदों में से कम से कम बीस सांसद भाजपा के साथ पाला बदलने की सक्रिय बातचीत में हैं। 10 जून को ही राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने इस्तीफा दे दिया। आठ जून को सुखेंदु शेखर रॉय जा चुके थे यानी छत टपक रही है और दीवारें भी हिल रही हैं। तृणमूल की यह दुर्दशा अकेली नहीं है। ओडिशा में बीजू जनता दल अंतिम सांसें गिन रहा है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी संकट में है। तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति हार के बाद संभल नहीं पाई। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल डूब रहा है। बंगाल में जो हो रहा है वह महाराष्ट्र की याद दिलाता है, जहां शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस के विद्रोही धड़ों को ही असली पार्टी की मान्यता मिल गई थी। ममता को डर है कि उनकी पार्टी का वही हश्र न हो। इसीलिए वे पहले से रास्ता बनाने की कोशिश में हैं।

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