संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि निजी स्वार्थ के कारण दुनिया संघर्षों का सामना कर रही है। ऐसे में भारत का अध्यात्म, सनातन से प्रेरित सर्व जन हिताय का मंत्र ही सही रास्ते पर ला सकता है। अशोक सिंघल आध्यात्मिक केंद्र के भूमि पूजन समारोह को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि आने वाला समय हिंदुत्व, सनातन का है जो अपने सर्वजन हिताय के मंत्र से दुनिया को नई राह दिखा सकता है। इस दौरान समारोह में उपस्थित शारदा पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी राज राजेश्वराश्रम महाराज ने कहा कि आध्यात्मिकता के बिना राष्ट्रवाद महज कोरी कल्पना है।
सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की आध्यात्मिक चेतना
संघ प्रमुख ने कहा कि हजारों साल पहले ऋषि मुनियों की परिकल्पना आधारित राष्ट्र का जन्म सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की आध्यात्मिक चेतना से उपजा। बाहरी सुख को ही अंतिम सुख मान लेने वाले पश्चिम के पास अधिकतम लोगों को खुश करने का ही मॉडल है, वह मानता है कि सबको खुश नहीं रखा जा सकता। उन्होंने कहा कि इसके उलट अध्यात्म के आंतरिक सुख की परिकल्पना से उपजा हमारा राष्ट्र सर्वजन हिताय की बात करता है। यह मानता है कि जड़, चेतन, चराचर और सृष्टि सब एक है। इसी विचार के आधार पर निर्मित भारत विविधता में एकता की शक्ति का प्रदर्शन करता है। अलग-अलग पूजा पद्धति को स्वीकार करते हुए विश्व कल्याण की बात करता है। भागवत ने कहा कि दुनिया यह नहीं जानती कि साथ रहने के लिए त्याग करना होता है। उसके विकास के मॉडल में सबको जीने देने की अवधारणा नहीं है। उनका विकास मिथ्या है। पश्चिम ने जो विकास का मॉडल तय किया है, उसमें इसे हासिल करने का एक मात्र रास्ता पर्यावरण का विनाश है। दूसरी ओर आध्यात्मिकता से उपजी हमारी सोच पूरी दुनिया को एक मानती है। इसमें सारे चर, अचर, निर्जीव, सजीव के लिए भी स्थान है। भारत की आध्यात्मितका आधारित सोच एक धन है, जो दुनिया को नई राह दिखा सकती है।
कोरा राष्ट्रवाद नहीं आध्यामिकता भी चाहिए
शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी राज राजेश्वराश्रम महाराज ने इस दौरान राष्ट्रवाद बनाम आध्यात्मिकता की बात की। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता के बिना राष्ट्रवाद अर्थहीन और प्रभावहीन है। उन्होंने कहा कि देश और दुनिया में आर्थिक विकास हो रहा है, मगर अध्यात्म के बिना यह विकास किसी काम का नहीं है। आध्यात्मिकता में पारिवारिक मूल्य हैं, आंतरिक सुख है। इसी अध्यात्म में अभिव्यक्ति और तर्क की कृति है। देश को आर्थिक विकास के साथ आध्यात्मिक विकास की भी जरूरत है।