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पांच ट्रिलियन डॉलर का जंगल व्यापार, अमीर हो रहे कारोबारी; फिर भी दाने-दाने को मोहताज वनवासी

दुनिया भर के जंगलों से हर साल अरबों रुपये की भारी भरकम कमाई होती है, लेकिन इसका फायदा उन गरीब वनवासियों को नहीं मिल रहा है जो इन जंगलों पर पूरी तरह निर्भर हैं। लकड़ी, शहद और जड़ी-बूटियों जैसे उत्पादों से होने वाली असली कमाई पर बिचौलियों और बड़े कारोबारियों ने कब्जा कर लिया है। इसके कारण जंगल के असली हकदार आज भी घोर गरीबी के जाल में फंसे हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट ने इस बड़े और कड़वे सच को दुनिया के सामने उजागर किया है। जंगलों से हर साल करीब 1.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार होता है। संयुक्त राष्ट्र की ‘ग्लोबल फॉरेस्ट गोल्स रिपोर्ट 2026’ के अनुसार, जंगल के पास रहने वाले लोग अपना कच्चा माल बहुत ही कम दाम में बेचने को मजबूर हैं। बाजार तक सीधे न पहुंच पाने और खराब रास्तों की वजह से सारा मोटा मुनाफा बीच वाले लोग यानी बिचौलिए खा जाते हैं। यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र वन मंच (यूएनएफएफ) की 21वीं बैठक में पेश की गई है, जो बताती है कि गरीब वनवासियों की हालत सुधारने के लक्ष्य बहुत धीमी गति से चल रहे हैं।

बिचौलिए कैसे हड़प रहे हैं वनवासियों की मेहनत की कमाई?
जंगलों से मिलने वाले कीमती उत्पाद जैसे बांस, लाख और तेंदूपत्ता करोड़ों लोगों के रोजगार का सबसे बड़ा साधन हैं। लेकिन इन गरीब लोगों के पास अपने माल को बड़े बाजार तक ले जाने की कोई सुविधा नहीं है। गांव में अच्छी सड़कें नहीं हैं और माल को सुरक्षित रखने के लिए कोई जगह नहीं होती है। इसका फायदा उठाकर बिचौलिए उनके माल को औने-पौने दाम पर खरीद लेते हैं। साल 2017 में ‘यूएन स्ट्रैटेजिक प्लान फॉर फॉरेस्ट्स 2017-2030’ के तहत दुनिया भर के लिए छह बड़े लक्ष्य तय किए गए थे। इनमें से एक सबसे खास लक्ष्य था जंगलों पर निर्भर लोगों को 2030 तक अत्यधिक गरीबी से पूरी तरह बाहर निकालना। लेकिन अब जो ताजा रिपोर्ट सामने आई है, वह बहुत ही चिंताजनक है। दुनिया इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में बहुत ही धीमी रफ्तार से आगे बढ़ रही है और करोड़ों परिवार आज भी गरीबी में कैद हैं।
भारत के 27 करोड़ वनवासियों के सामने क्या हैं जमीनी चुनौतियां?
भारत में लगभग 27 करोड़ लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए सीधे तौर पर जंगलों पर ही निर्भर हैं। सरकार ने इनकी मदद के लिए ‘वन धन विकास केंद्र’, ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी)’ और ‘स्वयं सहायता समूह’ जैसी कई अच्छी योजनाएं चलाई हैं ताकि उन्हें बाजार से जोड़ा जा सके। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जमीनी हकीकत आज भी ज्यादा नहीं बदली है। इन सरकारी कोशिशों के बाद भी भारत के वनवासी बिचौलियों के जाल से नहीं निकल पाए हैं और असली मुनाफा आज भी बड़े नेटवर्क तक ही पहुंच रहा है।

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