भारत में मोटापा बना नई महामारी: तीन दशक में वजन बढ़ने की रफ्तार दोगुनी, हर चौथा शहरी वयस्क इसकी चपेट में

भारत में मोटापा अब सिर्फ एक स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति के रूप में उभर रहा है। 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस बात पर चिंता जताई। 1990 में जहां देश की वयस्क आबादी में मोटापे की दर 9-10% थी, वहीं 2025 तक बढ़कर 20 से 23% तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह वृद्धि शहरीकरण, असंतुलित आहार, घटती शारीरिक गतिविधि और बढ़ते तनाव के संयुक्त असर का नतीजा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार 1990 के दशक में भारत में मोटापे की समस्या सीमित थी और ग्रामीण क्षेत्रों में बेहद कम थी। लेकिन 2000 के बाद आर्थिक विकास के साथ खानपान में बदलाव, पैकेज्ड फूड व शुगर ड्रिंक्स की बढ़ती खपत और जंक फूड के प्रसार ने स्थिति को बदल दिया। 2025 तक शहरी क्षेत्रों में हर चार में से एक वयस्क मोटापे से प्रभावित है। इसकी मुख्य वजह जीवनशैली का दबाव और खानपान की आदतें हैं। महानगरों और बड़े शहरों में लंबी ऑफिस दिनचर्या, घटती आउटडोर गतिविधियां भी मोटापे के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। प्रोसेस्ड, तैलीय और उच्च कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन तथा शारीरिक गतिविधि में कमी भी वजन बढ़ा रही है।
प्रति व्यक्ति तेल की खपत पांच गुना से ज्यादा बढ़ी
इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के अनुसार 1990 के दशक की शुरुआत में भारत में प्रति व्यक्ति खाने वाले तेल की औसत खपत 3.5 से 4 लीटर प्रति वर्ष थी। लेकिन शहरीकरण, आय में वृद्धि और पैकेज्ड व तैलीय भोजन के प्रसार के कारण 2025 तक यह बढ़कर 19 से 20 किलोग्राम प्रति वर्ष (1.6 से 1.7 किलो प्रति माह) हो गई है, यानी पिछले तीन दशकों में यह लगभग पांच गुना बढ़ गई है। वहीं डब्ल्यूएचओ के मानकों के अनुसार एक स्वस्थ वयस्क के लिए महीने में 500 से 600 ग्राम यानी रोज 15 से 20 ग्राम तेल का सेवन पर्याप्त है। इसके अधिक सेवन से मोटापा, हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़ का खतरा बढ़ जाता है।



