प्रदूषण से आपके फेफड़ों में हो रही है ये गंभीर बीमारी, ये लक्षण दिखते ही हो जाएं अलर्ट

दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर बीते कई दिनों से खतरनाक श्रेणी पर बना हुआ है। बीते कई दिनों से दिल्ली का औसत वायु सूचकांक 400+ है। हर साल नवंबर के तीसरे बुधवार को वर्ल्ड सीओपीडी डे मनाया जाता है। इस साल यह दिन आज यानी 19 नवंबर को है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) के बारे में जागरूक करना है। सीओपीडी श्वसन और फेफड़ों से जुड़ी एक बेहद गंभीर बीमारी है, जिसमें फेफड़ों स्थायी रूप से प्रभावित होते हैं। विश्व सीओपीडी दिवस के इस खास मौके पर आइए जानते हैं कि दिल्ली और एनसीआर में रहने वाले लोगों में वायु प्रदूषण फेफड़ों को कैसे स्थायी रूप से प्रभावित कर रहा है। वैसे तो इस बीमारी का मुख्य कारण धूम्रपान है, लेकिन दिल्ली में वायु प्रदूषण, खासकर PM2.5 जैसे सूक्ष्म कणों का अधिक स्तर, अब इस बीमारी का दूसरा सबसे बड़ा और तेजी से बढ़ता कारण बन गया है। ये अदृश्य कण इतने छोटे होते हैं कि वे फेफड़ों के सबसे भीतरी हिस्सों तक पहुंच जाते हैं, वायुकोषों को क्षतिग्रस्त करते हैं और सांस की नलियों में स्थायी सूजन पैदा करते हैं। प्रदूषित हवा में लंबे समय तक रहने से फेफड़ों का यह नुकसान धीरे-धीरे जमा होता रहता है, और 30 या 40 की उम्र के बाद इसके लक्षण सामने आने लगते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जो लोग कभी धूम्रपान नहीं करते थे, वे भी अब प्रदूषण-जनित सीओपीडी के शिकार हो रहे हैं। यह एक दबे पांव शरीर में घर करने वाली महामारी है जिसके प्रति तुरंत जागरूकता और बचाव के उपाय अपनाना आवश्यक है।

दिल्ली का प्रदूषण में मौजूद PM2.5 कण सीओपीडी के जोखिम कई गुना बढ़ा देते हैं। ये कण इतने छोटे होते हैं कि इन्हें फेफड़ों के प्राकृतिक फिल्टर रोक नहीं पाते। फेफड़ों के अंदर पहुंचकर, ये कण लगातार सूजन पैदा करते हैं। यह पुरानी सूजन सांस की नलियों को संकुचित कर देती है और फेफड़ों के ऊतकों को नष्ट कर देती है। यह नुकसान स्थायी होता है, जिसका अर्थ है कि एक बार फेफड़ों की कार्यक्षमता कम होने के बाद, इसे पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता। सीओपीडी के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य सर्दी-खांसी जैसे लगते हैं, इसलिए लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। इनमें लगातार बनी रहने वाली खांसी (जो 3 महीने से अधिक हो), बलगम का लगातार उत्पादन, और सांस फूलना शामिल है। अगर आपको हल्की शारीरिक गतिविधि (जैसे सीढ़ियां चढ़ना) के दौरान भी सांस लेने में दिक्कत महसूस होती है, तो यह फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी का संकेत हो सकता है। समय पर स्पाइरोमेट्री टेस्ट से इसका पता लगाया जा सकता है। प्रदूषण से प्रेरित सीओपीडी के खतरे को कम करने के लिए सतर्कता जरूरी है। सबसे पहले, धूम्रपान तुरंत छोड़ दें, क्योंकि यह प्रदूषण के साथ मिलकर जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है। दूसरा, अधिक AQI वाले दिनों में घर के अंदर रहें और बाहर निकलने पर N95/N99 मास्क का उपयोग करें। घर के अंदर की हवा को शुद्ध रखने के लिए HEPA फिल्टर वाले एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें।
सीओपीडी एक लाइलाज बीमारी है, लेकिन समय पर निदान और उचित उपचार (जैसे इनहेलर्स और पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन) इस बीमारी को धीमा कर सकते हैं और जीवन की गुणवत्ता में सुधार कर सकते हैं। 40 वर्ष से अधिक उम्र के ऐसे लोग जो लंबे समय से प्रदूषित हवा में रह रहे हैं या धूम्रपान करते हैं, उन्हें नियमित रूप से अपने फेफड़ों की जांच करानी चाहिए। जागरूकता ही इस रोग से बचाव का एकमात्र रास्ता है।



