Latest newsUncategorized

भारतीय दवा उद्योग पर बड़ा संकट, बढ़ सकती हैं पैरासिटामोल और एंटीबायोटिक्स की कीमतें

ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता का बुरा असर अब आम इंसान की सेहत और जेब पर पड़ने वाला है। दुनिया भर में सबसे ज्यादा सस्ती (जेनेरिक) दवाएं भेजने वाले भारत के दवा उद्योग पर एक बहुत बड़ा संकट मंडरा रहा है। इस युद्ध के कारण दवा बनाने के लिए जरूरी कच्चे माल की कमी हो सकती है, माल ढुलाई का खर्च बढ़ सकता है और सप्लाई चेन टूट सकती है। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले दिनों में पैरासिटामोल, एंटीबायोटिक्स और डायबिटीज जैसी आम बीमारियों की दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं और इनकी कमी भी हो सकती है। ट्रंप मौजूदा अमेरिका के राष्ट्रपति हैं और उनके नेतृत्व में अमेरिका का यह युद्ध वैश्विक व्यापार को भारी नुकसान पहुंचा रहा है।

फार्मेक्सिल (भारतीय औषधि निर्यात संवर्धन परिषद) और अन्य उद्योग संगठनों ने साफ चेतावनी दी है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव इसी तरह लंबे समय तक बना रहा, तो इसका बहुत भयंकर असर होगा। भारत लगभग 200 देशों को जेनेरिक दवाएं बेचता है। इस संकट का असर न केवल भारत पर पड़ेगा, बल्कि अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के उन तमाम गरीब देशों पर भी पड़ेगा, जो सस्ती दवाओं के लिए पूरी तरह से भारत पर निर्भर हैं। वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, भारतीय दवा उद्योग का आकार लगभग 50 अरब डॉलर का है। दुनिया की कुल जेनेरिक दवा आपूर्ति में भारत की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है। 

 

भारतीय दवा उद्योग की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?
भारत भले ही दुनिया को सस्ती दवाएं बेचता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि दवा बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल (एपीआई) इसे दूसरे देशों से मंगाना पड़ता है। साल 2025 में भारत ने लगभग 39,215 करोड़ रुपये के कच्चे माल का आयात किया था, जिसमें 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा अकेले चीन का था। विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के कारण समुद्री मार्गों, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य और खाड़ी क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही रुकने से कच्चे माल की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।

कौन सी प्रमुख दवाओं की सप्लाई पर सबसे पहले असर पड़ेगा?
कच्चा माल न पहुंचने का सबसे पहला और बड़ा असर उन दवाओं पर पड़ेगा जिनका इस्तेमाल हम रोजमर्रा की जिंदगी में करते हैं। सूत्रों के अनुसार, पैरासिटामोल, एंटीबायोटिक्स, ब्लड प्रेशर और डायबिटीज (मधुमेह) की दवाओं की सप्लाई पर सीधा संकट आ सकता है क्योंकि ये दवाएं मुख्य रूप से आयात किए गए कच्चे माल से ही बनती हैं। इसके अलावा, कैंसर की दवाओं और इंजेक्शन जैसी चीजों को तय तापमान में रखना होता है। लॉजिस्टिक्स उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि रास्ते बदलने और अतिरिक्त सुरक्षा के कारण माल ढुलाई का खर्च और समय दोनों बढ़ेंगे, जिससे दवाओं की लागत में भारी इजाफा होने की पूरी संभावना है। 

Related Articles

Back to top button