पश्चिम एशिया की राजनीति में एक बार फिर बड़ा मोड़ आता दिखाई दे रहा है। अमेरिका ने दावा किया है कि प्रस्तावित समझौते के तहत ईरान ने अनिश्चितकाल तक परमाणु हथियार विकसित न करने और न ही उन्हें हासिल करने की प्रतिबद्धता जताई है। ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी के इस बयान ने ऐसे समय में नई चर्चा छेड़ दी है, जब लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर वैश्विक स्तर पर तनाव बना हुआ है। यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो यह न केवल अमेरिका-ईरान संबंधों में बल्कि पूरे पश्चिम एशिया के सामरिक समीकरणों में बड़ा बदलाव ला सकता है। पश्चिम एशिया की राजनीति में एक बार फिर बड़ा मोड़ आता दिखाई दे रहा है। अमेरिका ने दावा किया है कि प्रस्तावित समझौते के तहत ईरान ने अनिश्चितकाल तक परमाणु हथियार विकसित न करने और न ही उन्हें हासिल करने की प्रतिबद्धता जताई है। ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी के इस बयान ने ऐसे समय में नई चर्चा छेड़ दी है, जब लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर वैश्विक स्तर पर तनाव बना हुआ है। यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो यह न केवल अमेरिका-ईरान संबंधों में बल्कि पूरे पश्चिम एशिया के सामरिक समीकरणों में बड़ा बदलाव ला सकता है।
क्या ईरान को प्रतिबंधों से राहत मिलेगी?
अमेरिकी अधिकारी के अनुसार प्रतिबंधों में ढील सीधे तौर पर ईरान की कार्रवाई से जुड़ी होगी। यदि ईरान परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अपने वादों को पूरा करता है और निरीक्षण प्रक्रिया में सहयोग करता है, तभी उसे आर्थिक लाभ मिलेंगे। अमेरिका का कहना है कि समझौते को इस तरह तैयार किया गया है कि दोनों पक्षों को एक साथ लाभ मिले। यानी पहले सत्यापन होगा और उसके बाद ही प्रतिबंधों में राहत दी जाएगी। अमेरिका का दावा है कि ईरान ने संवर्धित परमाणु सामग्री को समाप्त करने और परमाणु स्थलों को निष्क्रिय करने की दिशा में सहमति जताई है। हालांकि तकनीकी विवरणों पर अभी बातचीत जारी है। अधिकारी ने कहा कि मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान के पास ऐसा कोई ढांचा न बचे, जिसका इस्तेमाल भविष्य में परमाणु हथियार विकसित करने के लिए किया जा सके। अमेरिका का मानना है कि यह कदम वैश्विक सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा। अमेरिकी अधिकारी ने दावा किया कि इस समझौते को इस्राइल और खाड़ी देशों सहित अमेरिका के प्रमुख सहयोगियों का समर्थन मिल सकता है। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय देशों की सबसे बड़ी चिंता ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर रही है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी देश का आत्मरक्षा का अधिकार बना रहेगा। यदि ईरान समझौते की शर्तों का पालन नहीं करता है, तो क्षेत्रीय प्रतिक्रिया की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
क्या नागरिक परमाणु कार्यक्रम जारी रहेगा?
अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि उसे ईरान के नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम से कोई आपत्ति नहीं है। अधिकारी ने कहा कि कई देशों की तरह ईरान भी बिजली उत्पादन के लिए परमाणु ऊर्जा का उपयोग कर सकता है। लेकिन अमेरिका की चिंता उस तकनीकी ढांचे को लेकर है, जो नागरिक कार्यक्रम से आगे बढ़कर परमाणु हथियार निर्माण की क्षमता पैदा कर सकता है। इसलिए समझौते का फोकस ऐसे ढांचे को समाप्त करने पर है। अमेरिका के अनुसार समझौते में 60 दिनों की तकनीकी वार्ता का प्रावधान रखा गया है। इस दौरान दोनों पक्ष तकनीकी और निरीक्षण संबंधी बिंदुओं को अंतिम रूप देंगे। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यदि ईरान अपने वादों पर कायम रहता है तो उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ने और आर्थिक विकास के नए अवसर मिल सकते हैं। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह प्रस्तावित समझौता वास्तव में अंतिम रूप ले पाता है या नहीं। लेकिन इतना तय है कि इस बातचीत ने परमाणु विवाद को लेकर एक नई उम्मीद जरूर पैदा कर दी है।