गैस की ये कॉमन दवा आपको कैंसर का मरीज न बना दे? सामने आई चौंकाने वाली सच्चाई

पेट में अपच-गैस या बदहजमी होते ही क्या आप भी तुरंत पास के मेडिकल स्टोर से लाकर गैस की गोली खा लेते हैं? क्या आपको अंदाजा है कि ये छोटी सी लगनी वाली आदत बड़ी मुसीबतों का कारण तक बन सकती है? इससे कैंसर होने का भी खतरा बढ़ जाता है। वर्षों से सेफ और भरोसेमंद मानी जा रही गैस की एक गोली को लेकर दुनिया के कई देशों में अब विवाद है, कई ने तो इसे बैन तक कर दिया है, पर भारत में इसका लगातार और बड़ी संख्या में इस्तेमाल होता आ रहा है। हम बात कर रहे हैं गैस-एसिडिटी में सबसे ज्यादा इस्तेमाल में लाई जाने वाली दवा रैनिटिडीन की। ये दवा का एक सॉल्ट है, जो बाजार में कई अलग-अलग नामों से बेचा जा रहा है। यह दवा पेट में बनने वाले एसिड को कम करके तुरंत राहत तो दे देती है, पर अध्ययनों में पाया गया है कि लंबे समय तक या फिर इन दवाओं का नियमित इस्तेमाल कैंसर तक का कारण बन सकती है। इन्हीं खतरों को देखते हुए यूके-यूएस और सिंगापुर जैसे कई देश पहले से ही इसे बैन कर चुके हैं। कहीं आप भी तो इसका इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं?

भारत में ये दवा ओवर-द-काउंटर आसानी से उपलब्ध होती है। कम कीमत होने के कारण लोग इसका इस्तेमाल भी सबसे ज्यादा करते हैं।
- मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि रैनिटिडीन के साथ सबसे बड़ा खतरा ये है जब आप इसे स्टोर करते हैं तो इसमें एक केमिकल बनना शुरू हो जाता है। इसे एन-नाइट्रोसोडाइमिथाइलएमीन (एनडीएमए) कहा जाता है।
- अध्ययनों में पाया गया है कि ये एक अत्यधिक विषैला और संभावित कार्सिनोजेन (कैंसर पैदा करने वाला रसायन) है।
- यह एक पीले रंग का वाष्पशील कार्बनिक यौगिक है जो जल, हवा, कुछ सामान्य दवाओं व खाद्य पदार्थों में अशुद्धि के रूप में पाया जाता है।
- लंबे समय तक या फिर नियमित रूप से इसका संपर्क शरीर में कैंसर होने के खतरे को बढ़ाने वाला हो सकता है।
कैसे काम करती है ये दवा और कब बन जाती है खतरनाक?
रैनिटिडीन एक एच2-रिसेप्टर ब्लॉकर दवा है, जिसका मुख्य काम पेट में बनने वाले एसिड को कम करना होता है। इसका असर पेट की एसिड बनाने वाली कोशिकाओं पर पड़ता है, जिससे एसिड का उत्पादन कम हो जाता है और जलन या दर्द में राहत मिलती है। चूंकि ये जल्दी असर दिखाती थी और आसानी से उपलब्ध भी थी, इसलिए इसका बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया जाता रहा है। हालांकि अध्ययन में वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि रैनिटिडाइन की रासायनिक संरचना स्वाभाविक रूप से इसे एनडीएमए में बदलने लग जाती है है। खासकर जब दवा को कमरे के तापमान से अधिक तापमान पर रखा जाता है, तो इसका खतरा और भी बढ़ने लग जाता है।
- इसकी आंतरिक अस्थिरता के अलावा, दवा के निर्माण प्रक्रिया के दौरान भी एनडीएमए बन सकता है।
- यदि दवा को बचने के लिए या फिर सामान्य स्टोरिंग के दौरान भी उच्च तापमान के संपर्क में रखा जाता है तो भी एनडीएमए का खतरा रहता है।
- इसके पहले के भी कई अध्ययनों में एनडीएमए को इंसानों में कैंसर पैदा करने वाले एक संभावित तत्व के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- इतना ही नहीं इसके लंबे समय तक हाई डोज में इस्तेमाल को भी कैंसर का खतरा बढ़ाने वाला पाया गया है।
कई देश पहले ही कर चुके हैं बैन
रैनिटिडीन और इसके कारण होने वाले संभावित खतरों को देखते हुए पहले ही कई देशों ने इसके इस्तेमाल पर रोक लगा दी है।
- 2020 में, अमेरिकी एफडीए सहित कई रेगुलेटरी एजेंसियों ने सभी रैनिटिडीन टैबलेट को तुरंत हटाने का अनुरोध किया।
- संयुक्त राज्य अमेरिका के अलावा यूनाइटेड किंगडम, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा में भी दवा के साइड इफेक्ट्स को देखते हुए प्रतिबंधित या वापस ले लिया गया था।
- साल 2020 में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के नियामकों ने मूल दवाओं को वापस ले लिया था, लेकिन बाद में नए फॉर्मूले वाले और सुरक्षित दवा को फिर से मंजूरी दी गई।
- यूनाइटेड किंगडम में इसके सभी लाइसेंस निलंबित हैं। नेशलनल हेल्थ सर्विसेज ने इसे विश्व स्तर पर अनुपलब्ध के रूप में सूचीबद्ध करता है, और इसे डॉक्टर द्वारा लिखा नहीं जा सकता है। अमर उजाला से बातचीत में इंटरनल मेडिसिन के डॉक्टर विकास कुमार कहते हैं, रैनिटिडीन को लेकर लंबे समय से विवाद है। भारत में ये बैन तो नहीं है पर हम मरीजों को ये दवा प्रिस्क्राइब नहीं कर रहे हैं। इस दवा की जगह पर हम फैमोटिडाइन और सिमेटिडीन दवा लिखते हैं। ये दवाएं भी रैनिटिडीन की तरह एच2-रिसेप्टर ब्लॉकर हैं जो गैस-एसिडिटी कम करने में मदद करती हैं। पैंटोप्राजोल भी अच्छा विकल्प है। सबसे अच्छी बात इन्हें सुरक्षित पाया गया है। रैनिटिडीन की जगह पर फैमोटिडाइन और सिमेटिडीन थोड़ी महंगी जरूर हो सकती हैं और ये भी हो सकता है कि इसका असर देर से हो, पर सेहत को खतरा नहीं रहता। गैस या एसिडिटी की समस्या से बचने और हर बार दवा पर निर्भर होने के बजाय लाइफस्टाइल-खानपान में बदलाव सबसे ज्यादा असरदार होता है।
- खाने के तुरंत बाद न लेटें और ज्यादा मसालेदार, तेल वाले और प्रोसेस्ड फूड् कम खाएं।
- छोटे-छोटे अंतराल में खाना खाएं और पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी पेट की एसिडिटी को नियंत्रित करने में मदद करता है।
- प्राकृतिक उपाय जैसे अदरक, सौंफ, और छाछ भी हल्की एसिडिटी में राहत दे सकते हैं।
- नियमित व्यायाम और वजन नियंत्रण भी एसिड रिफ्लक्स को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।



